About Narikasambal

जय माँ दंतेश्वरी

“नारी का संबल” पत्रिका प्रारंभ करने का उद्देश्य

महात्मा गांधी’ का कथन है कि –विकास का अर्थ होता है “मानव जीवन के हर पहलू सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक पुनर्निर्माण या पुनरुद्धार |

वैसे ही ख़बरों का अद्भुत संसार है पत्रकारिता | आज पूरी दुनिया में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक चेतना का अद्भुत संचार हो रहा है, यही चेतना मनुष्य के विकास का परिचायक होती है| शायद यही कारण है कि मेरे मनोमष्तिष्क में भी इसी चेतना ने दस्तक दी हो | वैसे अनायास कुछ भी नहीं होता | बचपन से ही पढने का जुनून सवार था | हम भाई बहनों का बचपन प्रतिदिन नंदन, चम्पक, चंदामामा, चाचा चौधरी आदि बाल साहित्य की पुस्तकों का इंतजार करते बीता | फिर कुछ बड़े हुए तो युगधर्म, सरिता, मुक्ता, साप्ताहिक हिंदुस्तान, आगे हिंदी डाइजेस्ट, नवनीत, कादम्बिनी, उपन्यास आदि पर भी अपनी दीवानगी की हद पूरी की | तब मैंने कई पत्र सरिता, मुक्ता को भी लिखे थे जो कभी-कभी छप जाया करते थे, अफ़सोस उनका संग्रह आज मेरे पास उपलब्ध नहीं है | तब मुझे लगता यदि मैंने अपनी रचनाएं इन पत्र–पत्रिकाओं में भेजी तो क्या ये छप पाएंगी| भेजने में संकोच होता | समय के साथ–साथ माता-पिता भाई-बहनों के प्रोत्साहन ने मुझे मेरी लेखन कला को बनाए रखने में संजीवनी का काम किया |

1992 में दिल्ली पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्राचार के माध्यम से गृहणी होते हुए, ससुराल में रहकर ही पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद रायपुर आना हुआ तो अब तक की गृहणी ने इसे अपना कर्मक्षेत्र बनाया और अख़बार ज्वाईन कर लिया | अख़बारों में काम करते हुए भी मन विचलित हो रहा था लग रहा था कि मैं सिर्फ एक मशीन की तरह अपना जीवन जी रही हूँ यह मेरा पथ नहीं है मेरा जन्म तो किसी और कार्य के निमित्त हुआ है | क्या करूँ किस तरह मैं उन महिलाओं के काम आ सकती हूँ जिनको आज भी मंच नहीं मिलता अख़बारों में या साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में एक रचना छपवाने के लिए वे भीतर ही भीतर छटपटाती रहती हैं | बस तब मुझे अपना संकोच स्मरण हो आया कि हमारे ज़माने में बड़े पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं को कैसे रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाता था, बस यही सोच मेरे लिए संबल बना और मेरा उद्देश्य भी | मैंने ठान लिया कि मुझे ऐसा कुछ करना है कि इन पढ़ी-लिखी लेखन प्रतिभाओं के लिए कुछ कर सकूँ उनके काम आ सकूँ उनका संबल बन सकूँ |

संयोगवश उसी समय छत्तीसगढ़ राज्य बना और जनसंपर्क विभाग छत्तीसगढ़ आया | मैंने रजिस्ट्रेशन के लिए दिल्ली में आवेदन दिया | शीर्षक स्वीकृत होते ही अख़बार की दुनिया से पत्रिका की दुनिया में चली अपने लक्ष्य को साधने के लिए | शुरू-शुरू में मैंने कुछ सलाहकार भी बनाए किन्तु अफ़सोस यह बात सभी लघु पत्रिका के सम्पादक जानते हैं कि सलाहकार केवल अपना नाम छपवाने तक के लिए ही होते हैं | ( कुछ अपवाद हो सकते हैं ) पत्रिका के रंग,रूप, कलेवर, सामग्री से उन्हें कोई सरोकार नहीं होता वे सिर्फ अपना नाम पहले पेज पर देखना चाहते हैं | यह मेरा कटु अनुभव है | यह मैं इसलिए कह रही हूँ कि आपको लग सकता है कि पत्रिका में संरक्षक या सलाहकार की ज़रूरत क्या महसूस नहीं की गई होगी |एक बात और भी कि मुझे अफ़सोस बस इतना कि महिला संपादकों को उतना अच्छा प्रतिकार नहीं मिलता जितना पुरुष संपादकों को | यदि कोई पुरुष संपादक है तो उसे बड़ी शान से मंच पर बुलाया जाता है कि ये सज्जन इस पत्रिका के संपादक हैं और इतने सालों से पत्रिका सम्पादित कर रहे हैं जबकि, आप दस सालों से बीस सालों से भी पत्रिका का प्रकाशन करें आपको वो सम्मान महिला होने के नाते नहीं मिल पाएगा |खैर —
शुरू में जब मैंने पत्रिका के प्रकाशन का निर्णय लिया तब ठान लिया था कि घर से एक भी पैसा लगाकर कार्य नहीं करुँगी इसलिए मैंने अपनी दीदी शीतल देवांगन से कुछ सहयोग लिया और अपनी साहित्यिक मित्र और बड़ी दीदी लतिका भावे से भी सहयोग लेकर प्रकाशन का कार्य शुरू किया | जिसके लिए मैं आज तक उनकी आभारी हूँ |

मैं छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग की सराहना करती हूँ कि उन्होंने मुझे और मेरी पत्रिका को आज तक बराबर सहयोग किया है |(कुछ अंकों को छोड़कर) जिसके कारण पत्रिका शीर्षक रजिस्ट्रेशन के बाद से विगत 20 वर्षों से नियमित प्रकाशित हो रही है | साथ ही आज तक मैंने कई विशेषांक भी दिए हैं जिनकी बहुत सराहना हुई है | बेहद नाज़ुक और विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए भी पत्रिका को नियमित बनाए रखा | बस्तर जैसे पिछड़े क्षेत्र से आकर कोई घरेलु महिला 20 वर्षों तक पत्रिका चलने का उद्यम भी कर सकती है और इस उद्यम में, इस उद्देश्य में सफल रहती है